Saturday, 19 November 2022

वीर सावरकर के 'माफीनामे' को जिंदा करने से कांग्रेस को कितना होगा नुकसान?

इस देश में पहले अखिल भारतीय हिंदू महासभा की स्थापना करने और बाद में आरएसएस को मजबूत करने वाले विनायक दामोदर सावरकर यानी सावरकर की मौत के 56 साल बाद आज भी क्या यह नाम इतना महत्वपूर्ण किरदार है जो राजनीति में बड़ा उलटफेर करने की ताकत रखता है? 


ये सवाल इसलिये उठा है कि अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने उनकी तथाकथित माफ़ी मांगने के पुराने पड़ चुके मुद्दे को उसी महाराष्ट्र की धरती पर उठाया है, जहां उनका जन्म व मृत्यु हुई थी. इसलिये सियासी गलियारों में ये सवाल भी उठ रहा है कि गुजरात चुनाव से पहले इस चिंगारी को सुलगाकर कांग्रेस को कुछ फायदा होगा या बड़ा नुकसान?


हालांकि वीर सावरकर द्वारा अंग्रेज हुकूमत से माफ़ी मांगने का मुद्दा देश को आजादी मिलने के बाद से ही गरमाता रहा है और आज भी उसे जिंदा रखने का मतलब है कि यह नाम वोटों के ध्रुवीकरण यानी कि पोलराइजेशन करने का सबसे कारगर हथियार है. सिर्फ आरएसएस या बीजेपी ही नहीं बल्कि शिवसेना भी वीर सावरकर पर किसी भी सूरत में बुज़दिल, कायर या देशद्रोही का आरोप चस्पा करने को तैयार नहीं है. 


महाराष्ट्र में उनको आज भी एक सच्चे स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर मानते हुए उनका वैसा ही सम्मान किया जाता है. इसलिये राहुल गांधी को शायद ये गुमान नहीं था कि इस मुद्दे को उछालते ही कांग्रेस उसी शिव सेना के निशाने पर आ जायेगी जिसके साथ वह राज्य की महा विकास अघाड़ी सरकार में अहम हिस्सेदार रही है. हालांकि महाराष्ट्र समेत देश के बड़े वर्ग का मानना है कि हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है. उनकी इस विचारधारा के कारण आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें वह महत्त्व नहीं दिया जिसके वे वास्तविक हकदार थे.


दरअसल, वीर सावरकर पर राहुल गांधी के दिए बयानों ने शिवसेना को राजनीतिक धर्म संकट में डाल दिया है. अगर वह राहुल के बयान पर चुप्पी साध लेती है तो उसे अपनी सियासी जमीन खोने का बड़ा खतरा है. इसीलिये शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने फिलहाल तो इस पर प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन उन्होंने अपने खास सिपहसालार संजय राउत से बयान दिलवाकर पार्टी का स्टैंड साफ कर दिया है कि वो राहुल की बातों से जरा भी सहमत नहीं है. हालांकि बताया तो ये भी गया है कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे राहुल गांधी के इन बयानों से काफी नाराज हैं और नौबत ये भी आ सकती है कि वे महा विकास अघाड़ी गठबंधन यानी एमवीए से अलग भी हो सकते हैं.


शिवसेना नेता संजय राउत ने इसका संकेत देते हुए साफ कह दिया है कि ऐसे बयानों से एमवीए गठबंधन में दरार पड़ सकती है इसलिए राहुल गांधी को ऐसे मुद्दों से बचना चाहिए. राहुल गांधी ने जो सावरकर के बारे में बोला है हम उसका समर्थन नहीं करते हैं. हम सावरकर का बहुत सम्मान करते है. हालांकि इतिहास के इस तथ्य पर आज भी गहरे मतभेद हैं कि वीर सावरकर ने जेल से अपनी रिहाई के बदले में अंग्रेज सरकार से सचमुच माफ़ी मांगी भी थी या नहीं. केंद्र की मोदी सरकार साफ कह चुकी है कि इसका कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है इसलिये इस मुद्दे पर कोई भी बहस करना बेमानी है.


दरअसल, साल 2020 में संसद में कुछ सदस्यों ने ये सवाल पूछा था कि क्या सावरकर ने सेल्युलर जेल में रहते हुए ब्रिटिश हुकूमत से माफ़ी मांगी थी? 4 फरवरी को सरकार की तरफ से इसका जवाब देते हुए तत्कालीन केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल ने कहा था कि "अंडमान और निकोबार प्रशासन के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो कि सावरकर ने अंग्रेज़ों से माफ़ी मांगी थी या नहीं." तब उन्होंने ये भी कहा था, "जिस तरह की जानकारी अंडमान और निकोबार प्रशासन के आर्ट एंड कल्चर विभाग से मिली है उसके मुताबिक़ सेल्युलर जेल में रहते किसी तरह की दया याचिका देने का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है जिससे इस बात की पुष्टि हो कि उन्होंने माफ़ी मांगी थी या नहीं."


गौरतलब है कि केंद्र सरकार की ओर से वो बयान ऐसे वक़्त आया था जब हिंदू संगठन सावरकर को भारत रत्न देने की मांग कर रहे थे. लेकिन विपक्षी दलों ने इसका जबरदस्त विरोध किया था.

अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान महाराष्ट्र के अकोला पहुंचे राहुल गांधी ने वीर सावरकर के ‘माफीनामे’ की एक प्रति दिखाते हुए संघ व बीजेपी पर हमला बोला है. राहुल ने दावा किया है कि "सावरकर जी ने अंग्रेजों की मदद की थी. 


उन्होंने अंग्रेजों को चिट्ठी लिखकर दिखाते हुए कहा- सर, मैं आपका नौकर रहना चाहता हूं. राहुल गांधी ने यह भी कहा कि जब वीर सावरकर जी ने माफीनामे पर अपने  सिंगनेचर किए तो उसकी वजह डर थी. अगर वह डरते नहीं तो वह कभी सिग्नेचर नहीं करते. इससे उन्होंने महात्मा गांधी और उस समय के नेताओं के साथ धोखा किया था.’ राहुल ने ये भी कहा कि देश में एक तरफ महात्मा गांधी की विचारधारा है तो दूसरी तरफ सावरकर से जुड़ी विचारधारा है." लेकिन बड़ा सवाल है कि राहुल गांधी ने ये बयान देकर जिन दो विचारधाराओं का फर्क समझाने की कोशिश की है उसका देश की जनता पर कितना असर होगा?

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