Monday, 8 August 2022

मध्यप्रदेश में विदिशा की धरती पर फूंका गया था अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल, जलाई गई थी विदेशी वस्त्रों की होली

नई दिल्ली: भारत की स्वतंत्रता में वीर सपूतों का बलिदान शामिल है। यहां की हवा में उन कुर्बानियों की कहानियां हैं, जो किसी मां, बहन, पत्नी और बेटी ने दी हैं। आजादी के दीवानों ने एक पल भी अपनी जान की परवाह नहीं की और इस देश की धरती को स्वाधीन कराने के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया। आंदोलनों ने लोगों को जोड़ा और पूरा देश इस लड़ाई में एक सूत्र में पिरोता चला गया। मध्यप्रदेश की धरती पर भी स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने पराधीनता की बेड़ियां तोड़ने के लिए सर्वस्व लुटा दिया था।  


भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया था 


हमें स्वतंत्रता मिले 75 साल पूरे होने वाले हैं। देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस साल पूरे होने वाले हैं उस आंदोलन के आठ दशक, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया। और जिसका एक ही उद्देश्य था हिन्दुस्तान की आजादी। 9 अगस्त साल 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की गई थी। इस आंदोलन की शुरुआत बापू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के मुंबई अधिवेशन से की थी। उन्होंने 8 अगस्त को गोवालिया टैंक मैदान (मुंबई) में दिए अपने भाषण में इसकी घोषणा की और ‘करो या मरो’ का नारा दिया। अंग्रेजों ने महात्मा गांधी समेत तमाम समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया और बापू को नजरबंद कर दिया। जिसके बाद देश का गुस्सा उबल पड़ा। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन शुरू हुए और अंग्रेजों की काफी सख्ती के बाद भी इस आंदोलन को दबाना असंभव हो गया।  


मध्यप्रदेश में विदिशा से हुई आंदोलन की शुरुआत 


इस आंदोलन ने पूरे देश को एकजुट कर दिया था। हर वर्ग इस संघर्ष में शामिल हुआ। मध्यप्रदेश में इस आंदोलन की शुरुआत विदिशा जिले से हुई थी। इस दौरान विदिशा में भी नागरिकों ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर बगावत का बिगुल फूंका था। आसपास के जिलों के लोग भी इस आंदोलन में शामिल हुए थे। इसका नेतृत्व राम सहाय जी ने किया था। स्वतंत्रता के बाद रामसहाय मध्यभारत प्रांत के विधानसभा अध्यक्ष और तीन बार राज्य सभा सांसद भी चुने गए थे। स्वतंत्रता आंदोलन में विदिशा जिले का महती योगदान रहा है। 


ग्वालियर स्टेट का हिस्सा हुआ करता था विदिशा 


अंग्रेजों के शासनकाल में विदिशा ग्वालियर स्टेट का हिस्सा हुआ करता था। यहां कांग्रेस की गतिविधियां बैन थीं। यही वजह थी कि स्थानीय लोगों ने प्रजामंडल और सार्वजनिक सभा के नाम से संगठन बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियां की। जानकार बताते हैं कि 1937 में रामसहाय जी के घर पर बैठक हुई थी, जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने का फैसला लिया गया था। उसी दौरान सार्वजनिक सभा का गठन भी किया गया था। इसी संगठन के नेतृत्व में साल 1942 में शुरू किया था। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का सबसे बड़ा आंदोलन विदिशा में हुआ था। आंदोलन से जुड़े लोगों ने घर-घर जाकर विदेशी कपड़े जुटाए थे और शहर के चौराहों पर इन्हें जलाया गया था। इस आंदोलन में विदिशा के अलावा उज्जैन, शुजालपुर सहित कई जिलों के आंदोलनकारी भी शामिल हुए थे। 


भारत छोड़ो आंदोलन ने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत 


ब्रिटिश सरकार ने सत्ता का हस्तांतरण भारतीयों के हाथ में सौंपने का संकेत मिलने के बाद गांधी जी ने आंदोलन खत्म करने का फैसला लिया था, जिसके बाद करीब 10 हजार राजनैतिक बंदियों को रिहा किया गया था।  इस आंदोलन की वजह से भारत में ब्रिटिश हुकूमत की नींव बुरी तरह हिल गई थी। ये जन-जन का आंदोलन था, जिसने हमें आजादी का उजला सवेरा दिखाया था।  

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