Friday, 10 December 2021

दुष्कर्म केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला:पिता का पता लगाने जबरदस्ती बच्चे का DNA टेस्ट नहीं कर सकते, रेप पीड़िता की मंजूरी जरूरी



दुष्कर्म की वारदात के बाद जन्मे बच्चे के पिता का पता लगाने के लिए उसका DNA टेस्ट कराने के लिए पीड़िता को मजबूर नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुरुवार को एक अहम फैसले में यह बात कही। कोर्ट ने पॉक्सो कोर्ट के उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें रेप पीड़िता के बच्चे के पिता का पता करने का आदेश दिया गया था।

आदेश जस्टिस संगीता चंद्रा की एकल पीठ ने रेप पीड़िता की मां की ओर से दाखिल याचिका को मंजूर करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि सवाल यह नहीं था कि अभियुक्त पीड़िता के बच्चे का पिता है या नहीं, बल्कि पॉक्सो कोर्ट को यह तय करना था कि अभियुक्त ने पीड़िता से रेप किया है या नहीं।

सुल्तानपुर में 2017 में दर्ज हुई थी FIR
2017 में सुल्तानपुर की कोतवाली देहात थाने में पीड़िता की मां ने FIR दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया था कि अभियुक्त ने उसकी 14 साल की बेटी का 7 महीने पहले रेप किया था। जिससे उसकी बेटी गर्भवती है। जांच के बाद पुलिस ने आरोप-पत्र दाखिल किया।

किशोर न्याय बोर्ड ने खारिज की थी DNA टेस्ट की मांग
अभियुक्त के किशोर होने से मामले की सुनवाई किशोर न्याय बोर्ड में शुरू हुई। इस दौरान पीड़िता ने बच्चे को जन्म दिया। पीड़िता और उसकी मां की गवाही होने के बाद अभियुक्त की ओर से एक प्रार्थना पत्र दिया गया। इसमें बच्चे के DNA टेस्ट की मांग की गई। इसे किशोर न्याय बोर्ड ने 25 मार्च, 2021 को खारिज कर दिया।

पॉक्सो कोर्ट ने 25 जून को दिया था टेस्ट का आदेश
इसके बाद अभियुक्त ने पॉक्सो कोर्ट में अपील दाखिल की। पॉक्सो कोर्ट ने 25 जून को दिए आदेश में बच्चे का DNA टेस्ट का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ पीड़िता की मां ने हाईकोर्ट का रुख किया। मां की तरफ से दाखिल याचिका में कहा गया कि पॉक्सो कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि उसके DNA टेस्ट का आदेश देने से कहीं बच्चे के नाजायज होने की घोषणा न हो जाए। साथ ही मां भी चरित्रहीन तो घोषित नहीं हो जाएगी।

हाईकोर्ट ने आदेश को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की सहमति के बिना बच्चे के DNA टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता था। यह हो सकता है कि DNA टेस्ट से इंकार करना पीड़िता के खिलाफ जाए, फिर भी बिना सहमति के DNA टेस्ट का आदेश देना कानूनी तौर पर ठीक नहीं है।



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