Maharashtra: भगवान विट्ठल की पालखी यात्रा पर पाबंदी हटाने की मांग SC ने ठुकराई, कोरोना संक्रमण के कारण जुलूस पर राज्य सरकार ने लगाई है पाबंदी



महाराष्ट्र में वैष्णव प्रभु विट्ठल के भक्त वारकरी संप्रदाय से जुड़े लोगों ने विट्ठल एकादशी पर होने वाले पालकी जुलूस पर पाबंदी हटाने की मांग की थी. महाराष्ट्र सरकार की ओर से लगाई गई पाबंदी को हटाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी. लेकिन इस मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नही दी है. छूट देने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन.वी.रमना और न्या. ए.एस.बोपन्ना और ऋषिकेश रॉय की बेंच ने संत नामदेव महाराज संस्थान की ओर से दाखिल की गई याचिका को खारिज कर दिया.
महाराष्ट्र सरकार ने कोविड संकट की वजह से इस बार पालखी यात्रा और जुलूस पर पाबंदी लगाई है. याचिकाकर्ताओं ने इस पाबंदी को अपने मूलभूत अधिकारों के खिलाफ बताया है. याचिका में यात्रा को सीमित संख्या और अन्य एहतियाती उपायों के साथ सम्पन्न करने देने का आदेश देने की गुहार सुप्रीम कोर्ट से लगाई गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया और कोई राहत देने से मना कर दिया.
राज्य सरकार ने इस साल भगवान विट्ठल के भक्तों द्वारा जुलूस के रूप में पैरों से चल कर पंढरपुर की यात्रा करने पर पाबंदी लगाई है. कोरोना की दूसरी लहर अभी खत्म नहीं हुई है. एक बार फिर महाराष्ट्र में कोरोना के नए केस रोज आठ से दस हजार के बीच आ रहे हैं. कोरोनी की तीसरी लहर (Third Wave of Corona)का डर भी कायम है. सिर्फ 10 दिंडियों (पताका लेकर चलने वाले भगवान विट्ठल के भक्तों का झुंड) को राज्य सरकार ने अनुमति दी है. ये 10 दिंडियां बस में बैठ कर पंढरपुर दाखिल होंगी.
पिछले साल भी कोरोना की वजह से ‘पायी वारी’ (पैदल पंढरपुर तक तीर्थयात्रा) को रद्द किया गया था. इस बार भी राज्य सरकार ने पायी वारी को रद्द कर दिया है. राज्य सरकार ने लाखों वारकरियों (तीर्थयात्रियों) सहित रजिस्टर्ड 250 पालकियों की वारी (यात्रा) को अनुमति देने से मना कर दिया है. इसे वारकरियों ने अपने मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन माना. राज्य सरकार के इसी निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी और पैदल पंढरपुर जाने की अनुमति मांगी गई थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को ठुकरा दिया और एक साथ जुलूस की शक्ल में पैदल यात्रा की छूट देने से मना कर दिया.
क्यों लाखों की तादाद में भक्त जाते हैं हर साल पंढरपुर?
हर साल लाखों की तादाद में भगवान विट्ठल के भक्त उनके दर्शन के लिए पंढरपुर की यात्रा करते हैं. भगवान विट्ठल भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं. यह यात्रा हर साल एक जुलूस के रूप में संपन्न होती है, इस यात्रा को पंढरपुर की वारी कहा जाता है और इस तीर्थयात्रा को करने वाले तीर्थयात्रियों को वारकरी कहा जाता है. पंढरपुर में विराजमान भगवान विठोबा (विट्ठल) के दर्शन की यह यात्रा पैदल की जाती है जो लगभग 22 दिनों में आषाढी एकादशी के दिन पूरी होती है. पंढरपुर महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में भीमा नदी के किनारे बसा है, जिसे चंद्रभागा नदी के नाम से भी जाना जाता है. आषाढ़ का महीना भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए विख्यात है.
पंढरपुर तक पहुंचने वाली यह यात्रा कई जगहों से शुरू होती है. लेकिन इनमें से दो जगहों से शुरू होने वाली यात्राओं का महत्व सर्वाधिक है. ये दो यात्राएं पुणे के समीप आलंदी और देहू से शुरू होती हैं. आलंदी से संत ज्ञानेश्वर की और देहू से संत तुकाराम की पालखी यात्रा शुरू होती है. अलग-अलग जगहों से आने वाली यात्राओं का 21 वें दिन एक ही जगह पर संगम होता है. लगभग आठ सौ सालों से यह यात्रा जारी है. अपने माता-पिता की सेवा में रत पुंडरीक के आग्रह पर भगवान श्री विट्ठल अपने भक्त की चौखट पर प्रतीक्षा करते हुए कमर पर हाथ रख कर खड़े हैं. वे एक ही ईंट पर खड़े हैं क्योंकि भक्त ने उन्हें अभी तक बैठने को नहीं कहा है. और जब तक भगवान विठोबा खड़े हैं, उनके दर्शनों के लिए दिंडी-वारी आती रहेंगी.

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